Thursday, January 14, 2021

प्राचीन काल की शिक्षण विधियां (Teaching methods of ancient times)

 शिक्षण विधियां


प्राचीन शिक्षा काल में शिक्षण सामान्यता मौखिक रूप से होता था और प्रायः प्रश्नोत्तर शंका समाधान व्याख्यान और वाद-विवाद द्वारा होता था उस समय भाषा की शिक्षा के लिए अनुकरण विधि और कला कौशल की शिक्षा के लिए प्रदर्शन एवं अभ्यास विधियों का प्रयोग किया जाता था उपनिषदकारों ने शिक्षण की एक बहुत प्रभावी विधि का विकास किया था जिसे श्रवण, मनन और निधिध्यानसन विधि कहते हैं साफ जाहिर है कि उस समय उपयुक्त सब विधियों का प्रयोग कुछ अपने ढंग से होता था अतः यह इनके प्राचीन रूप को स्पष्ट करना आवश्यक है

1.  अनुकरण आवृत्ति एवं कंठस्थ विधि- 


 अनुकरण विधि सीखने की स्वाभाविक विधि है प्राचीन शिक्षा काल में प्रारंभिक स्तर पर भाषा और व्यवहार की शिक्षा प्रायः इसी विधि से दी जाती थी उच्च स्तर पर भी इसका प्रयोग होता था गुरु शिक्षा के सम्मुख वेद मंत्रों का उच्चारण करते थे शिष्य इनका अनुकरण करते थे तथा उन्हें बार-बार उच्चारित करते थे और इस प्रकार उन्हें कंठस्थ करते थे

2.  व्याख्यान एवं दृष्टांत विधि-

 प्राचीन शिक्षा काल में शिष्यों का व्याकरण का कोई नियम अथवा वेदों का कोई मंत्र कंठस्थ कर आने के बाद गुरु उसकी व्याख्या करते थे और उसके अर्थ एवं भाव स्पष्ट करते थे और उसके अर्थ एवं भाव को स्पष्ट करने के लिए उपमा रूपक और दृष्टांतो का  प्रयोग करते थे

3.  प्रश्नोत्तर वाद विवाद और शास्त्रार्थ विधि- 

 प्राचीन काल में उपनिषदों की शैली के आधार पर प्रश्न उत्तर वाद विवाद और शास्त्र शास्त्र विधियों का विकास हुआ प्रारंभिक शिक्षा काल में गुरु उपदेश देते थे, व्याख्यान देते थे और शिष्य उसे शांति पूर्वक सुनते थे प्राचीन शिक्षा काल में शिष्य अपनी संका प्रस्तुत करते थे और गुरु उनका समाधान करते थे शिक्षा में उच्च स्तर के शिष्य और गुरु के बीच वाद-विवाद भी होता था अति गूढ़ विषयों पर चर्चा हेतु अधिकारों और विद्वानों के सम्मेलन भी बुलाए जाते थे उनके बीच शास्त्रार्थ होता था शिष्य इन सब को सुनते थे और अपने तत्व संबंधी ज्ञान में वृद्धि करते थे

4. कथन प्रदर्शन एवं अभ्यास से विधि- 

प्राचीन शिक्षा काल में कृषि पशुपालन, कला कौशल, सैन्य शिक्षा और  आयुर्विज्ञान आदि क्रिया प्रधान विषयों की शिक्षा कथन, प्रदर्शन और अभ्यास विधि से दी जाती थी. गुरु सर्वप्रथम सिखाए जाने वाली क्रिया की संपादन की विधि बताते थे और फिर उसे स्वयं करके दिखाते थे  शिष्य उनका अनुकरण कर यथा क्रिया का अभ्यास करते थे और धीरे-धीरे उनमें दक्षता प्राप्त करते थे

5.  श्रवण मनन निदिद्यासन विधि-   

यह विधि भी उपनिषद कारों की देन है उस काल में गुरु जो भी व्याख्यान देते थे वेद मंत्रों आदि की जो भी व्याख्या करते थे धर्म दर्शन एवं अन्य विषयों के संबंध में जो कुछ भी जानकारी देते थे शिष्य उनको ध्यानपूर्वक सुनते थे उसके बाद उस पर मनन करते थे और चिंतन करते थे 

6. तर्क विधि- 


प्राचीन शिक्षा काल में तर्कशास्त्र जैसे गूढ़ विषयों की शिक्षण हेतु तर्क विधि का विकास हुआ उस समय इस विधि के 5 पद थे 
1. प्रतिज्ञा 
2. हेतु
3. उदाहरण 
4.अनुप्रयोग
5. निगमन 

7. कहानी विधि-

 प्राचीन शिक्षा काल में आचार्य विष्णु शर्मा ने राजकुमारों को नीति की शिक्षा देने के लिए कहानियों की रचना की यह कहानियां पंचतंत्र और हितोपदेश के नाम से संग्रहित हैं कहानी सुनाने के बाद आचार्य शिष्यों से प्रश्न पूछते थे इन प्रश्नों में अंतिम प्रश्न यह होता था कि इस कहानी से आपको क्या शिक्षा मिलती है

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