Friday, January 15, 2021

दयानंद सरस्वती (Dayanand Saraswati)

आर्य समाज के संस्थापक एवं वैदिक संस्कृति के संरक्षक स्वामी दयानंद सरस्वती की गणना उन महान विभूतियों में की जाती है जिन्होंने 19वीं शताब्दी में भारत जन जीवन में व्याप्त ज्ञानाअंधकार को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया है |  वेदों की ओर लौटो (बैक टू वेदास) का संदेश देखकर उन्होंने भारत और हिंदू धर्म को नवजीवन प्रदान किया वैदिक धर्म एवं भारतीय संस्कृति को पुनर्जीवित करना मानो उनके जीवन का आधार था 

उन्होंने भारतीय आत्मा का साक्षात्कार किया और राष्ट्रीय जीवन की प्रमुख शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया  | हीनत्व भावना द्वारा  ग्रसित यूरोपीय विचारों द्वारा पराभूत भारतीय जनता को विशेषकर बुद्धिजीवी वर्ग को भारत के गौरवपूर्ण अतीत से परिचय कराया और उसमें आत्मविश्वास को जागृत किया भारतीय जनमानस अब हीन भावना से मुक्त होकर स्वाभिमान से सर ऊंचा करने लगा था | 
रोमा रोला के शब्दों में " स्वामी दयानंद सरस्वती इलियट अथवा श्रीमद भगवत गीता के प्रमुख नायक के समान थे जिन्होंने हरक्यूलिस जैसी शक्ति के साथ हिंदू समाज के अंधविश्वासों पर प्रबल प्रहार किए वस्तुतः जगद्गुरु शंकराचार्य के बाद इतनी प्रखर प्रतिभा वाला अन्य कोई संत नहीं जन्मा"  इस समाजों द्वारा संत प्रवर ने गुजरात को मोरबी रियासत में टकारा नाम के छोटे से गांव में एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में सन 1824 ईस्वी में जन्म लेकर पिता श्री पंडित कृष्ण लाल त्रिवेदी की पारिवारिक जीवन को धन्य कर दिया उनका परिवारिक नाम मूल शंकर रखा गया इनकी पिताजी परंपरावादी से ब्राम्हण थे संभव है इनका नाम भगवान शंकर के नाम के साथ जोड़ा गया माता-पिता आशा करते थे कि उनका बेटा परिवार की धार्मिक संस्कार अपनाकर महान पंडित बनेगा बालक मूल शंकर प्रतिभा का धनी था उसने शीघ्र ही संस्कृत व्याकरण तथा वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया |
जब मूल शंकर की अवस्था 14 वर्ष की थी तब वह सत्य की खोज में प्रवृत्त हुए जब से ही पूत के पांव पालने में ही दिखाई पड़ने लगे थे यह घटना शिवरात्रि की थी जब बालक मूल शंकर ने शिवरात्रि का व्रत रखा शिवरात्रि की कथा सुनने के उपरांत मूल शंकर के मन में भगवान शिव के प्रति श्रद्धा भाव जागृत हुई साथ ही उनके मन में इस प्रकार के प्रश्न उत्पन्न होने लगी क्या पत्थर का पिंड भगवान शंकर ईश्वर हो सकता है ?
        उसी समय बालक ने देखा कि कुछ तो इस शिवलिंग के ऊपर उछल कूद कर रहे थे इस दृश्य को देखकर शिवजी तथा शिवरात्रि व्रत के प्रति उनका समस्त श्रद्धा भाव तिरोहित हो गया उन्होंने निश्चय कर लिया की वह ईश्वर की बारे में वास्तविकता के सत्य को करेंगें किशोर मूलशंकर उक्त विचारों की अधेड़ उम्र में बराबर लगा रहा अंततः मई 1845 ईस्वी के एक दिन उन्होंने गृह त्याग कर दिया वह 16 वर्षों तक भारत के विभिन्न स्थानों में भ्रमण करते हुए मथुरा पहुंचे वहां मूल शंकर की भेंट स्वामी विरजानंद से हुई स्वामी विरजानंद के रूप में उन्हें उस गुरु की प्राप्ति हुई जिन्हें वह इतने दिनों से तलाश रहे थे | निदान 14 नवंबर सन 1860 को उन्होंने स्वामी विरजानंद के सम्मुख सहज समर्पण कर दिया उन्होंने बालक मूल शंकर को वेदों का ज्ञान कराया और उनका नाम दयानंद रख दिया स्वामी विरजानंद से प्रेरणा प्राप्त करके स्वामी दयानंद ने सन 1863 ईस्वी में धर्म के नाम पर प्रचलित प्रखंडों का खंडन करने के लिए 'खंडन खंडित पताका' लहराई |

1863 धर्मोंपदेश के लिए विदा करते हुए उन्हें, गुरुदेव विरजानंद जी ने संदेश दिया कि "देश का उपकार करो सत्य शास्त्रों का उद्धार करो मत मतांतरों की दुविधा को मिटाओ और वैदिक धर्म फैलाओ" उन्होंने अनुभव किया कि देश में भारतीय ज्ञान की प्रतिज्ञान तो है ही साथ ही पर स्थित द्वेष और ईर्ष्या भी व्याप्त है उनकी धारणा थी कि उक्त दोषों का निवारण कर के देश में सत्य एवं सौहार्द का वातावरण उत्पन्न किया जाए अपने इस संकल्पना को साकार करने के लिए देश का भ्रमण करते हुए उन्हें सनातनी पंडितों तथा अनेक धर्म गुरुओं के विरोध का सामना करना पड़ा क्योंकि वह  धर्म का मूल आधार सिद्ध करते हुए मूर्ति पूजा का विरोध कर रहे थे ऐसा करते हुए उन्हें कई बार पंडित वर्ग से शास्त्रार्थ भी करना पड़ा था वैदिक धर्म पर आक्रमण करने वालों का उन्होंने डटकर सामना ही नहीं किया बल्कि प्रत्याक्रमण भी किया |

 धर्म प्रचार प्रसार और यात्रा क्रम में दयानंद अक्टूबर 1874 ईसवी को मुंबई पहुंचे और अंततः 10 अप्रैल सन् 1875 ईस्वी के दिन उन्होंने मुंबई में श्री मानिक चंद्र की वाटिका चिटगांव में प्रथम आर्य समाज की स्थापना की |इसके लगभग 2 वर्ष बाद लाहौर में विधिवत आर्य समाज की स्थापना हुई इसी अवसर पर आर्य समाज का विधान बना और अनेक समाजसेवी महानुभावों के सहयोग से देश के अनेक स्थानों में आर्य समाज की शाखाएं स्थापित हुई और भी कार्य करने लगीं | 

     कहने की आवश्यकता नहीं 17 नवंबर 1875 ईस्वी को न्यूयॉर्क अमेरिका में थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना हुई उसकी चिंतन का प्रमुख प्रेरणा स्रोत हिंदू धर्म दर्शन था स्वामी जी के व्यक्तित्व और वर्चस्व से प्रभावित होकर सोसायटी ने थियोसोफिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के नाम से मुंबई में अपना कार्यालय स्थापित किया था 

आर्य समाज की स्थापना के बाद स्वामी जी ने धर्म प्रचार का कार्य जारी रखा और भ्रमण करते हुए 17 मई 1883 में जोधपुर पहुंचे वहां उन्हें यह देखकर बहुत बुरा लगा कि जोधपुर नरेश राजा जसवंत सिंह  नन्हीं बाई नामक वेश्या की प्रेम में बुरी तरह जकड़े हुए थे इसके लिए उन्होंने जोधपुर नरेश को एक प्रकार से प्रताड़ित करते हुए वैश्या के  मोह से बाहर निकलने के लिए जोर दिया, नन्हीं भाई को भला यह कब सहन हो सकता था उसने षड्यंत्र करके स्वामी जी की दूध में विष दिया और 30 अक्टूबर 1883 ईस्वी के दिन उनका देहावसान हो गया उस समय उनकी आयु मात्र 59 वर्ष की थी


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