गांधी के परिपेक्ष्य में राज्यः-
गांधी
जी ने राज्य सत्ता का विरोध किया उसके लिए
निम्न कारण जिम्मेदार थेः-
1.
दार्शनिक
आधारः- भौतिक विकास
स्वतंत्रता के अभाव में नही हो सकता , जबकि राज्य शक्ति आधारित संगठन है ऐसे में
यदि राज्य विकास भी करना चाहे तो बाध्य विकास ही कर सकता है ।आन्तरिक नही अर्थात व्यक्ति का सर्वोत्तम विकास राज्य में
असंभव है ।
2.
लोग
राज्य की बात, कानून नियम इसलिए जानते है कि उन्हे दण्ड का भय होता है सवेच्छा से नही अर्थात बाध्यता में किया गया
कार्य नैतिकता की श्रेणी में नही आता ।
3.
केन्द्रीकृत
शक्ति होने के कारण गांधी जी का मानना था कि अत्याचारी होगा क्योंकि शक्ति नैतिक पतन करती है भ्रष्ट करती है । हिंसा के लिए प्रोत्साहित करती
है अर्थात राज्य एक हिसांत्मक संगठन है
इस प्रकार राज्य को स्वीकार नही किया जा
सकता है ।
4.
राज्य
अधिक से अधिक कार्यों को करता है ऐसे में व्यक्ति आत्मविश्वास और स्वायत्त गुणों
को बढ़ाने नही देता है । ऐसे में व्यक्ति के व्यक्तितत्व का विकास अवरुद्व हो जाता
है । इसलिए राज्य एक बुराई है राज्य को कम से कम काम दिया जाए ,राज्य को खत्म कर
दिया जाए ।
गाँधी
एक दार्शनिक अराजकतावादी के रुप मेः-
5.
गाँधी
अराजकतावादी दार्शनिक कोपाटिकन तथा टॉलस्टाय के विचारों से प्रभावित है गाँधी जी
को दार्शनिकों को श्रेणी में इसलिए रखा जाता है
क्योंकि इन्होंने नैतिक , आर्थिक
एवं राजनैतिक पर राज्य को कड़ी आलोचना की । इन्होने स्पष्ट किया कि राज्य
हिसांत्मकता है लोगों का शोषण करता है ।
6.
नैतिकता
का हनन करता है , बुराई को प्रोत्साहित करता है ऐसे में राज्य को समाप्त ही हो
जाना चाहिए । राज्य को केवल व्यक्ति रुपी पुस्तक का अंतिम अध्याय होना चाहिए ।
गाँधी जी के शब्दों में मनुष्य एक आत्मवान सचेतन प्राणी है । राज्य आत्महीन यंत्र है । जिसे हिंसा से पृथक नही
किया जा सकता है क्योंकि उसकी उत्पत्ति से ही हिंसा हुई है । ऐसे में एक व्यवस्था
चाहते है जिसकी उत्पत्ति अहिंसा से हुई हो ।
राज्य के सिद्वान्त के रुप में गाँधी राज्य को
अनावश्यक बुराई के रुप में गाँधी ऐसे में गाँधी जी ने राज्य के होते हुए भी उस
नजरअंदाज कर कैसे विकास किया जा सकता है
कैसे नैतिक उत्थान हो सकता है इसके लिए निम्न तीन सुझाव दिएः
7.
सत्ता
का विकेन्द्रीकरणः- भारत को यहाँ तक कि
राजनितिक चिंतन को गाँधी की यह बड़ी देन है
राजनितिक क्षेत्र में सत्ता के केन्द्रीकरण का प्रबल विरोध और
विकेन्द्रीकरण का चरम का उच्चता से निम्नता स्थिति तक बंटे होने से है । भारत में
प्रशासन की न्यूनतम इकाई गाँव है तो प्रशासन की शक्तियाँ गाँव को भी प्राप्त होनी
चाहिए । अर्थात गाँव के प्रशासन का प्रबंध एवं नियंत्रण स्वंय गाँवों के द्वारा
किया जाना चाहिए ।
गाँधी जी का आदर्श
समाज/ रामराज्यः-
गाँधी जी बार बार रामराज्य की कल्पना किया करते थे । किन्तु
उनका यह कथन कोई धर्म विशेष से नही जुड़ा हुआ था । यद्यपि राम राज्य की अवस्थआ
और आज की अवस्था मे एक लंबा भेद है । ऐसे में गाँधी जी को भी पता था कि
रामराज्य प्रांसगिक नही है किन्तु वह इसका
प्रयोग अलंकारिक और भावनावश करते थे
ना कि शाब्दिक /यदि देखा जाए तो गाँधी जी ने भी प्लेटो की तरह आदर्श राज्य
की कल्पना की और फिर व्यवहार से जोड़कर एक उपराज्य की कल्पना की ।
गाँधी जी के आदर्श
राज्य में कोई स्थान नही है । किन्तु गाँधी यथार्थवादी है , इसलिए इन्होने राज्य
को सीमित करने के साथ निम्न अग्रलिखित
रुपों में स्वीकार कर लियाः-
§ अहिंसात्मक समाज
§ शासन का स्वरुपः लोकतांत्रिक
§ सत्ता का विकेन्द्रीकरण
§ आर्थिक
विकेन्द्रीकरण
§ न्यासी आधार पर (Trustship) आर्थिक व्यवस्था ।
§ अस्प्रश्यता का अंत
§ धर्मनिरपेक्ष समाज
§ गोवध निषेध
§ मद – निषेध
§ निःशुल्क
प्रारम्भिक शिक्षा
§ वसुधैव कुटुम्बकम का भाव ।
राज्य की
उत्पत्ति के बारे में इनका मानना है कि राज्य शक्ति का परिणाम है, जो कि
लोगों में शोषण के कारण अस्तित्व में आया है ।जब तक समाज में शोषण बना रहेगा तब तक
राज्य का अस्तित्व बना रहेगा । तभी तक अराजकता की स्थिति भी बनी रहेगी । यद्यपि
ठीक ऐसा ही विचार मार्क्सवादियों का भी है । किन्तु गाँधी जी ने भी स्वीकार किया
कि बहुत से ऐसे उदाहरण है चूंकि राज्य के द्वारा व्यापक स्तर पर भलाई का कार्य
किया है। चूंकि स्वरुप में राज्य का आधार
शक्त है , जो हिंसा को बढ़ाती है। इसलिए गाँधी जी ने राज्य को अस्वीकार किया । अर्थात
गाँधी अराजकतावादियों के अत्यन्त नजदीक है, मार्क्सवादियों के नही । किन्तु आर्थिक
वितरण को लेकर गाँधी जी का झुकाव मार्क्स की ओर है । जहाँ मार्क्स ने राज्य विहीन
समाज की कल्पना कर साम्यवाद की स्थापना की । वही गाँधी जी ने राज्य को अनावश्यक
बुराई मानते हुए रामराज्य की स्थापना करने का प्रयास किया।

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