Monday, February 8, 2021

1930 के बाद से देश में सतत् कृषक संघर्ष का इतिहास रहा है। किन कारणों से ये कृषक संघर्ष तथा आंदोलन कृषि क्षेत्र में बड़े सुधार लाने में असफल रहे।

उत्तर :

उत्तर की रूपरेखा-

  • विभिन्न कृषक आंदोलनों की विशेषताओं का संक्षेप में उल्लेख करें।
  • स्वतंत्रता पूर्व हुए महत्त्वपूर्ण कृषक आंदोलनों का विवरण दें।
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के कृषक आंदोलनों का संक्षिप्त विवरण दें।
  • इन आंदोलनों में निहित कमियों का उल्लेख करें।
  • निष्कर्ष


स्वतंत्रता के पहले भारत में कृषि की दयनीय स्थिति के विरोध में कई कृषक-आंदोलन हुए, जिनकी निम्नलिखित विशेषताएँ थीं-

  • इन आंदोलनों में ज़मींदारों द्वारा अवैध और ऊँची लगान दरों के रूप में किये जाने वाले उत्पीड़न का विरोध किया गया।
  • ज़मींदारों द्वारा कृषि भूमि से किसानों की ज़बरन बेदखली का भी विरोध किया गया और साथ ही उन्होंने अपने लिये भूमि पर अधिकार के लिये एक निश्चित समय-सीमा निर्धारित करने की मांग की।
  • एकतरफा मुक्त व्यापार जैसी औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों का भी इन आंदोलनों में विरोध किया गया। 

कुछ महत्त्वपूर्ण कृषक आंदोलन-

  • अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना 11 अप्रैल, 1936 ई. को लखनऊ में किसान नेताओं ने की थी। 1923 ई. में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 'बिहार किसान सभा' का गठन किया। 1928 ई. में ‘आंध्र प्रांतीय रैय्यत सभा' की स्थापना एन.जी. रंगा ने की। उड़ीसा में मालती चौधरी ने 'उत्कल प्रांतीय किसान सभा' की स्थापना की। इनके द्वारा भू-राजस्व की दरें कम करने तथा किसान संगठनों को मान्यता देने की मांग रखी गई।
  • किसान आंदोलनों में 1946 ई. का बंगाल का तेभागा आंदोलन सर्वाधिक सशक्त आंदोलन था, जिसमें किसानों ने 'फ्लाइड कमीशन' की सिफारिश के अनुरूप लगान की दर घटाकर एक-तिहाई करने के लिये संघर्ष शुरू किया था। यह आंदोलन जोतदारों के विरुद्ध बंटाईदारों का आंदोलन था 'तेभागा आंदोलन' फसल का दो-तिहाई हिस्सा उत्पीड़ित बंटाईदार किसानों को दिलाने का आंदोलन था।
  • तेलंगाना आंदोलन आंध्र प्रदेश में ज़मींदारों एवं साहूकारों की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ तथा भ्रष्ट अधिकारियों के अत्याचार के विरुद्ध 1946 ई. में किया गया था।1858 ई. के बाद हुए किसान आंदोलनों का चरित्र पूर्व के आंदोलन से अलग था। अब किसान बगैर किसी मध्यस्थ के स्वयं ही अपनी लड़ाई लड़ने लगे।

भले ही स्वतंत्रता पूर्व कृषक आंदोलनों ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त नहीं की, परंतु इन आंदोलनों ने भविष्य में सुधारों के लिये पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। स्वतंत्रता के बाद के कृषक आंदोलनों में इसकी छाप दिखाई देती है-

  • 1967 के आस-पास शुरू हुए नक्सली आंदोलन का मुख्य मुद्दा हाशिये पर आ चुके कृषि समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा करना था। इस आंदोलन के दौरान कई किसान समितियों की स्थापना की गई और भूमि का पुनर्वितरण किया गया। हालाँकि माओवादी क्रांति लाने के लिये यह आंदोलन जल्द ही एक हिंसक संघर्ष में बदल गया।
  • 1980 में नए किसान आंदोलन में शरद जोशी के नेतृत्व वाले शेतकरी संगठना ने नासिक में सड़क व रेल रोको अभियान द्वारा राजनीतिक मंच पर उपस्थिति दर्ज की।

इन विभिन्न कृषक आंदोलनों में निम्नलिखित कमियाँ रहीं, जिनके कारण ये किसी बड़े कृषि सुधार को लाने में सफल नहीं हो पाए-

  • अपनी राजनीतिक पहुँच और कानूनों की जटिलता का लाभ उठाते हुए ज़मींदारों ने भूमि-सुधारों के प्रयासों को असफल करने की भरपूर कोशिश की।
  • ये आंदोलन किसानों के बड़े मुद्दों को केंद्र में रखते हुए लगातार जारी नहीं रखे गए। ऋण माफी जैसी छोटी मांगों से शुरू हुए कई आंदोलन जल्द ही समाप्त हो जाते थे।
  • शेतकरी संगठना के अलावा अन्य कोई ऐसा संगठन अस्तित्व में नहीं आया जिसने किसानों के साथ-साथ भूमिहीन श्रमिकों और कृषि कार्यों में रत महिलाओं की बात की हो।
  • राजनीतिक दलों और नेताओं पर इन आंदोलनों की निर्भरता ने भी अपेक्षित परिणामों की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न की।
  • हरित क्रांति के बाद से विभिन्न क्षेत्रों के किसानों के बीच असमानता में वृद्धि हुई है, जिसके कारण कृषक संघर्ष में लगी शक्ति भी प्रभावित हुई है। 

इन सभी कमियों के बावजूद यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि भारत में उल्लेखनीय  कृषि सुधार नहीं हुए। ज़मींदारी उन्मूलन, सहकारी समितियों का गठन, उर्वरक सब्सिडी, न्यूनतम समर्थन मूल्य और फसल बीमा जैसे उपायों ने भारतीय कृषि की दशा में काफी सुधार किया है।

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