लोकमान तिलक इस धारणा से पूर्णतया सहमत थे कि जो राष्ट्र अपने नायकों का सम्मान करना नहीं जानता है वह ना जीवित रह सकता है और ना विकास कर सकता है उन्होंने इस दृष्टि से गणपति उत्सव और शिवाजी उत्सव प्रारंभ किये | गणपति उत्सव का उद्देश्य था हिंदुओं में धार्मिक उत्साह और एकजुटता के भाव उत्पन्न करना शिवाजी उत्सव का उद्देश्य था जनता में स्वाभिमान और आत्मसम्मान की भावना को पुनर्जीवित करना तथा भारत के नव युवकों को शिवाजी की पद चिन्हों पर चलने के लिए प्रेरित करना, जिससे वे भी मानसिक दासता से मुक्त हो और राजनीतिक दासता से मुक्ति के लिए प्राणपण से प्रयत्नशील हो |
शिवाजी जयंती के अवसर पर उनके द्वारा कहे गए शब्द ध्यान देने योग्य हैं, "भाट की तरह गुणगान करने से स्वतंत्रता नहीं मिल जाएगी स्वतंत्रता के लिए शिवाजी की तरह और बाजी की तरह साहसिक कार्य करने पड़ेंगे|" महाराष्ट्र की हिंदुओं में वीरता का भाव उत्पन्न करने के लिए उन्होंने गौ हत्या विरोधी सोसाइटी में स्थापित की और देश की स्वतंत्रता के नाम पर बलिदान होने की प्रेरणा प्रदान करने के लिए व्यायामशालाये स्थापित की तथा अखाड़े खोलें जिनमें कुश्ती आदि के अलावा लाठी चलाना जैसी शिक्षाएं भी दी जाती थी |
तिलक का राष्ट्रवाद अंशतया पुनरुत्थान वादी और पुनर्निर्माणवादी था उन्होंने तथा श्रीमदभगवद्गीता से आध्यात्मिक शक्ति एवं राष्ट्रीय उत्साह ग्रहण करने का संदेश दिया और बताया कि भारत को प्राचीन परंपराओं की आधार पर ही आज की भारत के लिए स्वस्थ राष्ट्रवाद की स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है 13 दिसंबर 1919 ईस्वी में 'मराठा' के अंक में उन्होंने लिखा था कि "सच्चा राष्ट्रवादी पुरानी नीव पर ही निर्माण करना चाहता है |" जो सुधार पुरातन प्रति सम्मान की भावना पर आधारित हो, उसको मैं सच्चा राष्ट्रवादी कार्य नहीं समझता हम अपनी संस्थाओं को अंग्रेजी के ढांचे में नहीं डालना चाहते सामाजिक एवं राजनीतिक सुधार के नाम पर हम उनका आराष्ट्रीयकरण नहीं करना चाहते उन्होंने अपना यह मत कई बार व्यक्त किया था कि पुरातन का अनादर करना पतन का प्रतीक है भारतीय संस्कृति की पुनर्जागरण द्वारा ही भारत में सच्ची राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रवाद की स्थापना की जा सकती है |
तिलक के अनुसार राष्ट्रवाद आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक धारणा है प्राचीन काल में आदिम जातियों के मन में अपने कबीले के प्रति जो भक्ति रहती थी, उसी का आधुनिक नाम राष्ट्रवाद है | तिलक की दृष्टि में सब प्रकार की सामाजिक, धार्मिक, जातीय आदि एकता की बिना ना हम उन्नति कर सकते हैं और ना राष्ट्रवाद की स्थापना कर सकते हैं इस दृष्टि से वह सार्वजनिक उत्सव को बहुत महत्वपूर्ण मानते थे | उनके अनुसार उत्सव प्रतीक का काम करते हैं जिनसे राष्ट्रवाद की भावना पनपती है राष्ट्रीय उत्सव राष्ट्रीय गान राष्ट्रीयध्वज आदि देवासियों की राष्ट्रीय भावना को सुप्त नही होने देते हैं | इसे राष्ट्रवाद का प्रतीकात्मक प्रदर्शन कहा जा सकता है | तिलक ने प्राचीन उत्सवों को किस प्रकार आधुनिक राष्ट्रीय आवश्यकता के अनुकूल बना दिया यह निसंदेह उनकी राजनीतिक नई सूझ का एक सुंदर उदाहरण है |
तिलक ने राष्ट्रवाद की संदर्भ में आर्थिक कारणों को भी महत्वपूर्ण माना था उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि देश की गरीबी का कारण शासन द्वारा आर्थिक शोषण था भारत का कच्चा माल विदेश जाता था और वह पक्का माल बनकर आता था और इस प्रकार भारत की लूट की जाती थी जब तक देश के विपुल पूंजी का विदेश जाना बंद नहीं होगा तब तक देश की गरीबी दूर ना हो सकेगी वह दादाभाई नरोजी की आर्थिक निष्कासन सिद्धांत से सहमत थे और इसी दृष्टि से उन्होंने स्वदेशी आंदोलन चलाया था यह आंदोलन वस्तुतः देश में पूंजीवाद की वृद्धि और उनके विस्तार के विरुद्ध आंदोलन था
कुछ लोगों के मतानुसार तिलक हिंदूवादी और मुसलमान विरोधी थे यानी वह कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी थे अंग्रेज इतिहासकार पॉवल प्राइस ने लिखा है कि तिलक की असहिष्णुता से पृथकत्व की भावना को बल मिला था मुस्लिम लीग भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जवाब थी मुसलमानों का एक बहुत बड़ा भाग कांग्रेस की राष्ट्रीय आंदोलन से अलग रहा इसका कारण रजनी सामदत, तिलक और अरविंद की विचारधाराओं को माना है |
तिलक के बारे में उक्त प्रकार की धारणा को कई विद्वानों ने भ्रांति बताया है इसके लिए उन्होंने कई तर्क प्रस्तुत किए हैं यथा तिलक की राष्ट्रवाद में केवल धार्मिक पुनरुत्थान नहीं है, उन्होंने राष्ट्रवाद के आर्थिक पक्ष को भी स्वीकार किया है जिन्ना, एम. अंसारी, इमाम हसन, शौकत अली, इशरत मुहानी आदि कई मुसलमान नेताओं ने समय-समय पर तिलक के विचारों की सराहना की थी वस्तुतः वह हिंदू राष्ट्रवाद के समर्थक ना होकर शक्तिशाली एवं शूरत्व तो प्रधान राष्ट्रवाद के संस्थापक थे
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