Monday, January 18, 2021

प्राचीन भारत में शिक्षा प्रणाली (Education system in ancient India)

सर्वप्रथम शिक्षा के महत्व एवं उपयोगिता को प्राचीन शिक्षा वर्णित गुणों से ही जान लेते हैं. हमारी सभ्यता विश्व की सर्वाधिक रोचक तथा महत्वपूर्ण सभ्यता है इसमें हमारी शिक्षा पद्धति का महत्वपूर्ण योगदान रहा, उसमें समय-समय पर संशोधन भी हुए इसमें भौतिक तथा आध्यात्मिक उत्थान की अपार संभावनाएं थी जिसके बल पर हम अपने उत्तरदायित्व का विधिवत निर्वाह भी करते रहे. वैदिक युग से ही इसे प्रकाश का स्रोत माना गया है भारतीय शिक्षा व्यवस्था में दर्शन वाद, संस्कृति, मतवाद, समाज एक ही बिंदु पर टिके हुए हैं जबकि पाश्चात्य व्यवस्था में अंतर देखने को मिलता है.
 सुभाषित रत्न संदोह में कहा गया है कि ज्ञान मनुष्य का तीसरा क्षेत्र है जो उसे समस्त तत्वों के मूल को जानने में सहायता करता है तथा सही कार्यों को करने की विधि बताता है महाभारत में वर्णित है कि नास्ति विद्यासम् चक्षु नास्ति  सत्यसम तपः अर्थात विद्या के समान नेत्र तथा सत्य के समान तक कोई दूसरा तप नहीं |
         शिक्षा या विद्या को सदैव मोक्ष का साधन माना गया है  सा विद्या या विमुक्तये सुभाषिरत्न भंडार के अनुसार जीवन की समस्त कठिनाइयों तथा बाधाओं को दूर करने वाले ज्ञान रूपी नेत्र जिसे प्राप्त नहीं है वह वस्तुतः अंधा है .
शिक्षा द्वारा प्राप्त एवं विकसित की गई बुद्धि को ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति माना जाता है हम विद्या के विविध उपयोग इस प्रकार भी बता सकते हैं जैसे यह माता के समान रक्षा करती है, पिता के समान हितकारी कार्यों में नियोजित करती है, पत्नी के समान दुखों को दूर कर आनंद पहुंचाती है, यस तथा वैभव का विस्तार करती है यह कल्पना के समान गुणकारी है.
      विद्या विनय प्रदान करती है विनय जी पात्रता (निपुणता) आती है पात्रता से व्यक्ति धन प्राप्त करता है, धन से धर्म तथा अंततोगत्वा सुख की प्राप्ति होती है विद्या को वैसा धन माना गया है जो वह करने पर भी बराबर बढ़ता रहता है.
यदि ब्राह्मण भी विद्या रहित है तो वह सूद के समान ही है विद्या से विहीन व्यक्ति वस्तुतः पशु तुल्य है प्राचीन भारतीय में दृष्टि में शिक्षा मनुष्य की सर्वांगीण विकास का साधन थी 
  मात्र पुस्तक ज्ञान प्राप्त करना ही नहीं अपितु मनुष्य के स्वास्थ्य का भी इसका घटक रहा है, यह भी कहा गया है कि यदि शास्त्रों का ज्ञाता भी मूर्ख है यदि उसने कर्मशील व्यक्ति के रूप में निपुणता प्राप्त की है तो शिक्षा के द्वारा मनुष्य आजीविका का उत्तम साधन भी प्राप्त कर सकता है लेकिन इसको मात्र आजीविका का साधन मानना ही हमारी दृष्टि में बहुत उत्तम नहीं माना गया शिक्षा मनुष्य के लिए अजीवन चलाने वाली वस्तु है.

 नीचे दिए गए ज्ञान को व्यापक धाराओं में विभाजित किया गया था -
1.  परा- ऐसा ज्ञान जो हमें वेदों से प्राप्त होता है उच्चतर और आध्यात्मिक ज्ञान है
2. अपरा- जो हमें जीवन से मिलता है निम्न और धर्मनिरपेक्ष विज्ञान है
शिक्षा व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक उत्थान का सर्व प्रमुख माध्यम है अध्यापक भी उस व्यक्ति को माना गया है जो सदैव विद्यार्थी भी बना रहता है 
मूल रूप से, शिक्षा की प्रक्रिया में शामिल तीन बुनियादी चरणों की समझ शामिल थी -
1. श्रवण - श्रुति या श्रवण द्वारा ज्ञान प्राप्त करने की अवस्था.
2. मनन- यहां मनन का अर्थ विद्यार्थियों के लिए संज्ञानात्मक योग्यता को विकसित करने का है विद्यार्थी श्रवण करते हैं उसका स्वयं विश्लेषण करें वह अपने शिक्षक द्वारा सिखाए गए पाठों को आत्मसात करें और अपने स्वयं के निष्कर्ष बनाए.
3. निदिध्यासन-  इसका अर्थ है सत्य की समझ और उसे वास्तविक जीवन में लागू करना

      सभी लोगों के अलग-अलग झुकाव होने के बावजूद जीवन का मुख्य लक्ष्य आत्म साक्षात्कार है संस्कृति चरित्र की श्रेष्ठ आदर्शों का संरक्षण और उनका संवर्धन मुख्य उद्देश्य थे यहां भीतर और बाहर दोनों का ध्यान रखकर व्यक्ति का समग्र विकास करना है वैदिक शिक्षा के तहत शब्दों पडा या अक्षरों के सही उच्चारण पर विशेष ध्यान दिया जाता था भारतीय ऋषियों ने स्वयं को सुपात्र, समझदार संसार और आध्यात्मिक शक्तियों के अध्ययन के लिए समर्पित किया और इसके अनुसार अपने जीवन को उस तरह ढाला.
        छात्रों का प्रवेश औपचारिक समारोह उपनयन (दीक्षा) द्वारा किया जाता था यह कहा जाता था कि गुरू के नए घर में उनका दूसरा जन्म हुआ और उन्हें द्विदोबारा जन्म लेने वाला कहा जाता था शिक्षा 5 वर्ष की आयु से (विद्याररंभ) नामक एक समारोह से आरंभ होती थी यहां अक्षर सीखना और देवी सरस्वती की पूजा करना सम्मिलित रहता था.
      उपनयन समारोह 8 से 12 साल की उम्र के बीच शुरू होगा, उसे अब ब्रह्मचरिण कहां जाएगा, अपनी शिक्षा समाप्त करने के बाद एक ब्रह्मचारिण बनने के योग्य हो जाता है 
   महिलाओं के लिए भी उच्च शिक्षा की थी घर में वे संगीत और नृत्य सीख सकती थी उन्हें भी उपनयन समारोह से गुजरना पड़ता था .
यहां मत (धर्म सदाचार या कर्तव्य) आदर्श प्रथाओ और आचरण का कुल संयोजन था उन्होंने मानव 'सुम्मम बोमन' की आदर्श के प्रति समर्पण के साथ अपने कर्तव्य की पहचान कि, यहां उद्देश्य 'चित्त वर्ती निरोधा' माना गया जिसको संसार की मानसिक और यथार्थ पूर्ण गतिविधियों का मिश्रण समझा गया.

No comments:

Post a Comment

Thanks for your love

Summary in short

Current Affairs Questions And answers

  Question 1. Consider the following statements- 1) The World Economic Forum issues the Global Energy Transition Index every year. 2) In...