Saturday, January 16, 2021

तुलनात्मक राजनिति अध्ययन

तुलनात्मक राजनिति अध्ययन

दो राजनितिक व्यवहारों के बीच तुलना करना तुलनात्मक राजनिति है  । एक जैसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किए जा रहे व्यवहारों की तुलना होती है ।

तुलनात्मक राजनिति के उद्देश्यः

·         राजनिति विज्ञान को समग्र क्रम से व्यवस्थित करना हैए इसे अत्यधिक समृद्व बनाने की क्रिया है । राजनितिक विज्ञान को विज्ञान का रुप प्रदान करना 

·         सिद्वान्तों का प्रतिपादन करना ।

 अध्ययन का महत्वः

·         तुलनात्मक राजनिति के द्वारा राजनितिक व्यवहार को समझा जा सकता है ।

·         राजनितिक विज्ञान के लिए सामान्य सिद्वान्त के निर्माण के लिए आवश्यक ।

·         पहले से चल रहे सिद्वान्तों की प्रमाणिकता की जाँच के लिए  आवश्यक ।

·         राजनितिक विज्ञान को वैज्ञानिकता प्राप्त कराने के लिए आवश्यक ।

राजनिति

1      व्यवहार
2      अनुभव
3      विशेष दृ विशेष परिस्थितियाँ
4     मूर्तमूर्त
तुलना
5     अमूर्त सिद्वान्त
6      सर्वमान्य
7      देश ए काल परिस्थितियों से परें

 
सर्वमान्य सिद्वान्त

·         व्यवस्थित सिद्वान्त

·         सिद्वान्त

·         विशेष तत्व

·         व्यवहार

·         अव्यवस्थित सिद्वान्त

·         सिद्वान्त

·         विशेष तत्व

·         व्यवहार. क्रम नियम नही है

 ईस्टर्न ने चार प्रकार के निर्गतों की बात कीः.

·         शुल्क कर ए व्यक्तिगत सेवाओं के रुप में ।

·         आचरण का नियमन जिसमें मानवीय क्रियाकलापों की व्यापक श्रृंखला शामिल है ।

·         वस्तुओं ए सेवाओं ए अवसरों ए स्मारकों आदि का आवंटन ।

·         प्रतीककाल निर्गत जैसे मूल्यों का समर्थन ए राष्ट्रध्वज का प्रदर्शन ए नीतिगत उद्देश्यों की सूचना।

अंतिम प्रक्रिया पुर्ननिवेश या फीडबैक की है  और यह एक प्रतिक्रियास्वरुप होने वाली गतिविधि है । और  यह एक जैसी प्रतिक्रिया देती है । जो वर्तमान और भावी गतिविधियों को प्रभावित एवं रुपान्तरित करती है । पुर्ननिवेश के बाद पुर्नबदलाव आता है ।  जो राजनितिक परिवेश के उद्देश्य की प्राप्ति में मदद करता है ।

संरचनात्मक/प्रकार्यात्मक उपागम (आमण्ड-पावेल)

डेविड ईस्टर्न के कार्य से प्रभावित होकर ग्रैबील आमण्ड ने राजनितिक व्यवस्था को आधार मानकर  इसकी संरचना  और कार्य प्रणाली को अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया । जिसे बाद में सरंचनात्मक प्रकार्यात्मक  उपागम कहा गया । तुलनात्मक राजनिति में इस उपागम का सर्वाधिक प्रयोग इसलिए किया जाता है  क्योकिं यह उपागम विभिन्न राजनितिक व्यवस्थाओं के लिए वर्गीकरण मानक उपलब्ध  कराता है ।  इस मॉडल का प्रयोग इससे पहले समाजशास्त्र में किया गया था । दुर्खीम के बाद टालकट पार्सन्स ए राबर्ट मर्ट ए मैरियन  लेवी द्वारा भी समाजशास्त्र में इसका प्रयोग किया गया । आमण्ड ने अपनी पुस्तक  The Politics of the Developing Area ( 1960 )  में सरंचनात्मक प्रकार्यात्मक उपागम कि विकास किया । 

आमण्ड  का मानना था कि वह जिस राजनितिक व्यवस्था को परिभाषित कर रहे है । वह परस्पर संवाद की एक व्यवस्था है  जो सभी विकसित और पिछड़े समाज को वैधपूर्ण भौतिक दबाव के माध्यम से एकीकरण करने और सुलझाने की भूमिका में होती है । यह राजनितिक व्यवस्था समाज में एक वैध सुव्यवस्थित तथा परिवर्तनकारी व्यवस्था को बनाए रखने वाली है । किसी भी व्यवस्था के लक्षण होते है ।

1.       व्यापकता

2.       परस्पर निर्भरता

3.       सीमाओं की मौजूदगी

 व्यापकताः

इसका अर्थ है कि राजनितिक व्यवस्था में सभी प्रकार की पारस्परिक क्रियाएँ अर्थात निवेश निर्गत होते रहते है  जो भौतिक दबाव अथवा उसके प्रयोग से संभावित हो पाते है सभी पारस्परिक क्रियाओं में कानून के अतिरिक्त अन्य राजनितिक पहलू भी जुड़े रहते है । जैसें .  बंधुता एवेश पंरपरा ए पंव ए जाति समूह ए दंगे एप्रदर्शन आदि की प्रक्रियाएँ  भी राजनितिक व्यवस्था का ही एक अंग है ।

परस्पर निर्भरताः

जब कभी किसी एक वर्ग के क्रियाओं मे बदलान आने से उससे सम्बन्धित दूसरे वर्ग ध् उपवर्ग में भी बदलाव हो तो उसे परस्पर निर्भरता कहते है । जैसे किसी भी देश में चुनाव दृ सुधार की प्रक्रिया उसके दलीय  व्यवस्थाए संसद की कार्यप्रणाली ए मंत्रिपरिषद तथा नौकरशाही तक की व्यवस्था  पर प्रभाव डालता है । सूचना प्रौद्योगिकी में आए परिवर्तन ने चुनाव के तरीके में बदलाव किया है  और तरीके में आए बदलाव से सरकार के उत्तर दायित्व तथा पारदर्शिता में भी परिवर्तन आया है ।

सीमाओं की मौजूदगीः

राजनितिक व्वयस्था में सीमा रेखा का अर्थ है कुछ ऐसे बिन्दु जहाँ अन्य व्यवस्थाएँ समाप्त हो जाती है ए वहाँ  से राजनितिकव्यवस्था की शुरूआत होती है जैसे बाजार का असंतोष और शिकायते तब तक प्रवेश नही कर पाती  जब तक वह संघर्ष वा हिंसा  प्रदर्शन का विकराल रूप नही ले लेती । आमण्ड ने अपनी व्यवस्था के द्वारा यह बताने का प्रयास किया है कि सभी राजनितिक व्यवस्था (उन्नत या पिछड़े)  वर्ग में चार विशेषताएँ होती हैः

·         सभी राजनितिक व्यवस्था की राजनितिक संरचना होती है ।

·         सभी राजनितिक व्यवस्थाएँ एक ही प्रक्रिया का संपादन करती है ।

·         सभी राजनितिक संरचनाएँ बहुकार्यात्मक होती है ।

·         सभी राजनितिक व्यवस्था सभी राजनितिक सांस्कृतिक धार्मिक विषयों में मिश्रित व्यवस्था कहलाती है ।

आमण्ड ने अपने इस संरचनात्मक प्रकारात्मक सिद्वान्त में निवेशए निर्गत और उपनिवेश को भी शामिल किया गया  चूंकि राजनितिक व्यवस्था के सीमांकन  की बात आमण्ड करते है  इसलिए चार प्रकार के निवेश और 3 प्रकार के निर्गत को स्वीकार किया गया ।

निवेश के 4 रूपः.

·         राजनितिक समाजीकरण एवं नियोजन

·         हितो की अभिव्यक्ति

·         हितों का समूहीकरण

·         राजनितिक संचारः.

इसी प्रकार निर्गत नीति निर्माणए नीतियों का क्रियान्वयन और नीति निर्णय है । निर्गत का कार्य केवल सरकारी  भूमिकाओं के अनुरूप ही होगा । इसका सम्पादन विधायिका ए नीति निर्माण ए कार्य पालिका ए नीतियों का क्रियान्वयन ए नीति न्याय के माध्यम से औपचारिक अंग द्वारा किया जाता है ।

राजनितिक सामाजीकरणः

इसके द्वारा राजनितिक व्यवस्था में निवेश का कार्य किया जाता है । यह पहला निवेश का प्रकार इसका अर्थ यह है कि नीति की प्रक्रिया जिसके द्वारा राजनितिक मूल्यों का निर्माण होता है और राजनितिक सांस्कृतिक का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संचार होता है ए राजनितिक सामाजीकरण कहलाता है ।

विभिन्न समाजों में राजनितिक समाज अलग अलग प्रकार का होता है  । यह समाजिक, आर्थिक राजनितिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा होता है । जिसमे परिवार धार्मिक संस्थान ; मंदिर, मस्जिद, सामुदायिक समूह  हर जाति  सम्बन्ध, प्रादेशिक सम्बन्ध,  स्कूल, जनसंचार, माध्यमस्वंय सेवी  संघ, सरकारी, गैर सरकारी संस्थान आदि समाज में व्यक्ति के समाजीकरण को आकार देते है और व्यस्क जीवन में यही सम्बन्ध और सहभागिता इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है ।

समाजीकरण का रुप प्रत्यक्ष. अप्रत्यक्ष दोनों होता है । प्रत्यक्ष राजनितिक समाजीकरण का अर्थ यह है कि जब राजनितिक व्यवस्था में भूमिकाओंए निवेश ए निर्गत के साथ सूचना ए मूल्य का सुस्पष्ट हो जबकि अप्रत्यक्ष राजनितिक समाजीकरण  तब होता है जब मूल्यों और विचारों के संचार के साथ साथ अन्य समाजिक व्यवस्था ; परिवार द्की भी भूमिका निवेश निर्गत को प्रभावित करती है

 हित अभिव्यक्तिः

·         संगठनात्मक

·         असंगठनात्मक

प्रत्येक राजनितिक व्यवस्था में कुठ सुस्पष्ट हित, दावे और मांगे होती है ये हित संचार द्वारा राजनितिक व्यवस्था में पहुचाँए जाते है इन हितों का सम्बन्ध निकटता से राजनितिक समाजीकरण और राजनितिक सांस्कृति से जुड़ा होता है । राजनितिक व्यवस्था में अनेक हित समूह अलग अलग हितों की मांग कर रहे होते है । आमण्ड में राजनितिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की भूमिका निभाने वाले चार प्रकार के हित समूहों की बात की हैः.

·         संस्थात्मक हिस समूह ; विधायिका ए कार्यपालिका एसेना ए नौकरशाही 

·         गैर संघीय हिस समूह ; जातीय संगठन, प्रादेशिक, धार्मिक वर्गीय 

·         अपवादात्मक हित समूह ; दंगे,  प्रदर्शन, आन्दोलन, हित समूह 

·         संघीय हित समूह ; व्यापार  संघ, व्यवसायिक, उद्योगपतियों का समूह 

·         औपचारिक हित समूह

·         अनौपचारिक हित समूह

·         किसी विशेष हित को लेकर होता है ।

 समूहीकरण की भूमिकाः.

समूहीकरण का अर्थ है सामान्य नीतियों का प्रतिपादन करना ए प्रत्येक राजनितिक व्यवस्था में समूहों द्वारा उठाई गई  और हितो को एकत्रीकरण का अपना तरीका होता है ष और सबको जोड़ कर सिद्वान्त से प्राप्ति का प्रयास किया गया जाए । आमण्ड यह भी कहता है कि अभिव्यक्ति एवं एकत्रीकरण में बहुत कम अंतर होता है  कभी कभी अंतर अनिश्चित होता है । यह समूहीकरण बाध्य और आंतरिक दोनों होता है । यह राजनितिक व्यवस्था के निर्णयों के निर्माण को प्रभावित करता है   जैसे विधायिका , कार्यपालिका आदि हित समूह के भीतर उपसमूहीकरण प्रारम्भ हो जाता है ।

राजनितिक संचार प्रकार्य:-

किसी भी राजनितिक व्यवस्था में सभी प्रकार की भूमिकाँए जैसे राजनितिक समाजीकरण वा नियोजन ए हित अभिव्यक्तिए हित समूहीकरण, नीति निर्माणए नीतियों का क्रियान्वयन और निर्णयों सभी संचार के माध्यम से ही सम्पन्न होते है । ऐसे तरह तरह के सभी संचार के माध्यम है जिनके द्वारा लोगों को राजनितिक  व्यवस्था में होने वाले निवेश और निर्गत के कार्यो की जानकारी होती है यह जानकारी  मीडिया, सिनेमा, इंटरनेट, पत्रिकाओं आदि के माध्यम से प्राप्त होती है । ऐसा कहा जा सकता है कि आज की आधुनिक राजनितिक व्यवस्था वह जीवित प्राणी है जिसे आक्स पहुंचानें का कार्य मीडिया कर रहा है । इसके माध्यम से ही लोकतंत्र राजतंत्र ; राज्य की व्यवस्था  की आजादी को संरक्षण प्रदान करती है

आमण्ड → 4 प्रकारकी निर्गत मांग

·         राजनितिक सामाजीकरण

·         हित अभिव्यक्ति

·         समूहीकरण

·         संचार

राजनितिक व्यवस्था मांगों के राजनितिक व्यवस्था में प्रवेश पाने के बाद सरकार के कार्य जो नीति निर्माण ए नीति क्रियान्वयनए और नीति निर्णय से शुरू होती है । जिसमें विद्यायी ए कार्यकारी और न्यायिक भूमिकाएँ समानातंर  संचालित होती है । यहाँ आमण्ड का मानना है कि राजनितिक व्यवस्था का स्वरुप इस भूमिका  पर बल देता है जैसे - लोकतान्त्रिक, सत्तावादी, सर्वाधिकारवादी, सैनिक और तानाशाही  आदि  

आमण्ड ने राजनितिक व्यवस्था के विकास की दो विशेषताओं का वर्णन किया है (1) सरंचनात्मक विभेदीकरण और (2) संस्कृति की चित्रकालिता । राजनितिक व्यवस्था में पहला बदलाव भूमिका में अंतर या संरचनात्मक अंतर होता है  । अंतर या विभेदीकरण का अर्थ है कि प्रक्रियाएँ जिनके माध्यम से भूमिका में परिवर्तन हो  या ने स्वायत्त बनती है । या नए प्रकार की भूमिका स्वीकार करती है । संस्कृति की चित्रकालिता का सम्बन्ध राजनितिक संस्कृति से है ।  इस सिद्वान्त के द्वारा हम किसी भी राजनितिक व्यवस्था के इतिहास, वर्तमान और भविष्य की नीतियों को जान सकते है ।

        राजनितिक सांसकृतिक उपागमः.संस्कृति शब्द का अर्थ विभिन्न समुदायों में भिन्न भिन्न परिपेक्ष्यों में लिया जाता है । जैसे जनजातीय संस्कृति पश्चिमी संस्कृतिण् इस्लामी संस्कृति, अफ्रीकी संस्कृति  आदि । सामान्यतः संस्कृति का अर्थ किसी विशेष समुदाय की जीवन शैली से लिया जाता है । भारत में शहरों के उच्च वर्गीय  युवाओं की संस्कृति  गाँव के युवाओं की संस्कृति से भिन्न है । इसी प्रकार खान, पान, वेशभूषा, मान्यताओंए, नियमों, मूल्यों आदि के आधार पर उत्तर भारत की संस्कृति दक्षिण भारत से बिल्कुल अलग है ।

        इसी प्रकार अन्य देशों में  भी जीवन शैली का ढ़ंग  अलग अलग होने के कारण उनकी सभी व्यवस्थाएँ भी सामाजिक ए आर्थिक ए राजनितिक  भी भिन्न होती है। परंपराओं, रीति. रिवाजों, रहन-सहन, आचरण, संहिता   आदि पर निर्भर करती है । यदि व्यापक  अर्थों कमे देखें तो  प्रत्येक देश के अपने राजनितिक नियम कानून होते है । और ये कानून जनता की मनोवृत्ति और सरकार के प्रति प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है । जैसे  अमेरिका में देशभक्ति का भावए जापानियों में राजनेता के प्रति निष्ठा का भावए फ्रांसीसियों में संघर्षशीलता प्रवृत्ति और ईरानियों का परमाणु प्राप्ति के प्रति आकांक्षाएँ ये दर्शाते है  कि किस प्रकार लोग की मनोवृत्ति राजनितिक नियम और राजनितिक नियम राजनिति को प्रभावित करते है ।

आमण्ड और सिडनी बैरबा दे दि सिविल कल्चरण् पालीटिकल एटिट्यूडस एण्ड डेमोक्रेसी इन फाइव नेशन्स नामक एक किताब लिखी । इसमें उन्होनें न्ण्ैण्। और जर्मनी, इटली और मैक्सिको के राजनैतिक ऐतिहासिक अनुभवों का राजनितिक संस्कृति के रुप में तुलनात्मक अध्ययन किया ध् पावेल ने लिए  राजनितिक संस्कृति शब्द का प्रयोग किया है जिसमें मुख्य रुप से राजनितिक व्यवस्था के प्रति स्वयं की भूमिका को शामिल किया गया है जब हम किसी समाज के राजनितिक संस्कृति की बात करते है  तो इसका अभिप्राय जनता की भावनाओं और मूल्यांकन पर आधारित राजनितिक व्यवस्था से होता है । अर्थात जनता गैर दृ राजनितिक व्यवस्थाओं मे भाग लेती है । ऐसे ही राजनितिक व्यवस्था में भाग लेती है । यदि संस्कृतियों  में टकराव आता है तो राजनितिक संस्कृतियों में भी टकराव आता है ।

  किसी राज्य की राष्ट्रीय राजनितिक संस्कृति उस राज्य के सदस्यों के बीच राजनितिक तत्वों के प्रति अभिमुखता के स्वरुपों का वितरण होता है । आमण्ड और बैरवा व्यक्तिगत राजनितिक अभिमुखता की बात करते ह । अभिमुखता का अर्थ राजनितिक तत्वों  के सम्बन्धों तथा सरोकारों से सम्बन्धित है । निम्न तीन प्रकार के अभिमुखताओं का वर्णन किया गया हैः.

·         संज्ञानत्मक अभिमुखताः. राजनितिक व्यवस्था का ज्ञान, उसमें विश्वास, उसकी भूमिका निभाने वाले पदाधिकारी का ज्ञान, निवेश और निर्गत ।

·         भावनात्मक अभिमुखताः. राजनितिक व्यवस्था की कार्यशैली,  कार्यो का प्रदर्शन और अनुभव ।

·         मानांकन अभिमुखताः. राजनितिक विषयों का मूल्याकंन, मानदण्ड और कार्यशैली का मिश्रण ।

राजनितित व्यवस्था में निवेश और निर्गत पहलुओं  तथा राजनितिक कर्ता स्वरुप स्वयं के प्रति संज्ञानात्मक भावनात्मक और मानांकन अभिमुखताओं के कारण तीन प्रकार की  राजनितिक संस्कृति को जन्म देती है

संकीर्ण राजनितिक संस्कृतिः.

राजनितिक संस्कृति में जनता को सरकार एवं राजनिति का बहुत कम ज्ञान  होता है । जनता अधिकांश निरक्षर होती है । अधिकांश लोग ग्रामीण और सुदुर  क्षेत्रों में रहते है । जो राजनिति का उनके जीवन पर  प्रभाव कम पड़ता है । अफ्रीकी जनजातीय समाज, स्थानीय स्वायत्त, समाज इसी श्रेणी में आते है । ऐसे समाजों में राजनिति की कोई विशेष भूमिका नही होती  इसी कारण संकीर्ण राजनितिक व्यवस्था में बदलाव की इच्छा का अभाव  होता है ।

 आत्मगत राजनितिक संस्कृत

इस प्रकार की राजनिति में जनता निष्कृय रुप से सरकारी कर्मचारियों और कानून का पालन करती है ।  न तो मतदान करती है और न ही  राजनिति में सक्रिय सहभागित दर्शाती है । व्यवस्था में निर्गत पहलुओं के प्रति उचच अभिमुखता होती है  । किन्तु निवेश के कार्य में ये उदासीन होते है ।

सहभागीतापूर्ण राजनितिक संस्कृतिः.

राजनितिक संस्कृति में जनता सरकार तथा राजनिति से भली. भांति परिचित होती है । राज्य के समक्ष मांगे प्रस्तुत करती है ए प्रदर्शन के आधार पर राजनेताओं को समर्थन भी प्रदान करती है । ऐसे समाज के लोग राजनितिक प्रशासनिक संरचनाओं और प्रक्रिया में भी रूझान दिखाते है । निवेश और निर्गत दोनो हीं पहलुओ से राजनितिक व्यवस्थ में भाग लेते है । ये राजनितिक व्यवस्था में आत्मगत रुप से सक्रिय भूमिका निभाते है । अपनी स्वीकृति तथा अस्वीकृति देकर प्रदर्शन का मूल्यांकन प्रदर्शित करते है ।

प्रत्येक राष्ट्र में उपरोक्त तीनों प्रकार की राजनितिक व्यवस्थाएँ संस्कृतियाँ पाई जाती है । जो राजनितिक व्यवस्था अर्थात लोकतंत्र ए समाजवाद से अलग होती है । किसी भी समाज में राजनितिकए संस्कृति विशुद्व रुप से न होकर सहभागितापूर्ण ना आत्मगत न संर्कीण होती है । ये तीनों का सम्मिश्रण होती है । यद्यपि इसमें से कोई एक प्रभुत्वपूर्ण हो सकता है ।

आमण्ड ने नागरिक संस्कृति शब्द का प्रयोग किया इसका अर्थ वह सम्मिश्रण राजनितिक संस्कृति से लेता है । लोगो से राजनिति में सक्रिय राजनिति संस्कृति सहभागिता से नही बल्कि तार्किकता से प्रेरित दृष्टिकोण की सहभागिता की आशा की जाती है । यदि अपने हितो के लिए सिद्वान्तों के हिसाब से सावधानीपूर्वक आकलन कर मतदान किया जाता है । तो इसी आधार पर  लोग स्वंय अपनी मदद कर सकते है । राजनिति में निवेश की इस प्रक्रिया को तार्किक सक्रियवाद कहा जाएगा । नागिरक संस्कृति तर्कपूर्ण सक्रियवाद मॉडल को अपनाने की बात करता है 

 राजनितिक अर्थ व्यवस्था उपागमः

तुलनात्मक राजनिति यद्यपि राजनिति के सभी विषयों को महत्व देती है  किन्तु राजनितिक के अध्ययन को केवल राजनित तक सीमित करके नही देखा जा सकता । पृथक रुप से राजनिति उतनी मजबूत नही होगी जितनी कि धार्मिकए आर्थिक पक्षों के अध्ययन को जोड़कर । इसलिए तुलनात्मक राजनिति में अर्थव्यवस्था और  राजनी के मध्य एक सम्बन्धों की खोज तथा किसी भी राजनितिक घटना को अर्थव्यवस्था के परस्पर संवाद की व्यवस्था स्थापित करना राजनितिक उपागम कहलाता है । यह उपागम नाम से राजनिति और अर्थव्यवस्था के संवाद की प्रक्रिया है किन्तु यह इतना ही नही बल्कि समाज के उन सभ सामाजिक  राजनिति आर्थिक, संस्थात्मक क्षेत्रों के आर्थिक पहलुओं को भी जांचने का प्रचार करता जो व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करते है ।राजनितिक अर्थव्यवस्था की संकल्पना सम्बन्धों पर ध्यान देती है । इस संकल्पना का विशिष्ट अर्थ सैद्वान्तिक या वैचारिक परंपरा पर निर्भर करता है । जिसे उदारवादी या मार्क्सवादी परंपरा से जोड़ा जा सकता है । राजनितिक अर्थव्यवस्था के मार्क्सवादी  समीक्षकों वा राजनितिक घटनाओं  को अलग से समझने के लिए दुनिया के अनेक विचारकों  को प्रभावित किया । दास कैपिटल  को  । बतपजपब व िच्वसपजपबंस म्बवदवउल का उपनाम दिया गया । जिसमें वस्तुए पूंजी, अतिरिक्त, मूल्य, भूमि, सम्पत्ति, वेतन, मजदूरी, जैसे शब्दों से समाज के सम्बन्धों को समझाने का प्रयास किया गया । बाद में इन्ही के आधार पर प्रतियोगी राज व्यवस्थाओं की सकंल्पना आगे  आती है । इस प्रकार मार्क्स द्वारा दिया गया  सामाजिक राजनितिक विश्लेषण को यद्यपि मार्क्सवादी चिन्तन नाम दिया गया । फिर भी इसके अंतर्गत सभी सामाजिक राजनितिक घटनाक्रम में सिर्फ आर्थिक पक्ष पर ही ध्यान दिया गया ।

    राजनितिक अर्थव्यवस्था उपागम का विकासः.यह एक आधुनिक संकल्पना है  यद्यपि राजनिति के प्रारम्भ से ही आर्थिक गतिविधियों क्रियाकलापों को महत्व मिलता है । प्लेटोए अरस्तुए हॉब्सए लॉकए रूसोंए बेन्थम ए कौटिल्य आदि राजनितिक दार्शनिकों के विचारों में भी अर्थ को महत्व मिलता है  किन्तु एक प्रथक प्रक्रिया के रुप में यह लोकप्रिय नही हुआ ।

14वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक वाणिज्यवाद के प्रभाव के कारण आर्थिक मामलों में अहस्तक्षेप की नीति पर ध्यान दिया जाना प्रारम्भ हुआ । परिणास्वरुप मुक्त बाजारए आर्थिक उदारवाद और परिणामस्वरुप ए वैश्वीकरण जैसी प्रक्रियाओं की शुरूआत हुई । एडम स्मिथ, रिकार्डो,मार्क्स  आदि विचारकों के द्वारा जब पृथक रुप समस्त गतिविधियों का विश्लेषण आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा जाने लगा तब जाकर एक पृथक आर्थिक सिद्वान्त का निर्माण हुआ । राज्य के कार्य केवल संरक्षणवादी थे ध् व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता को बनाए रखना राज्य का उद्देश्य था । जो आगे बढ़कर पुनः व्यक्तिवाद से पूंजीवाद और आगे लोककल्याणकारी राज्य में परिवर्तिति हो जाता है । वर्तमान में लोगो के अथवा समाज के आर्थिक हितों की पूर्ति आर्थिक संसाधनों का समानुपातिक वितरण करने वाला राज्य ही उत्तरवादी राज्य और लोककल्याणकारी राज्य कहलाता है ।

इस राजनितिक अर्थव्यवस्था उपागम के विकास में सैद्वान्तिक विचारधाराओं का महत्वपूर्ण योगदान है । उदारवाद, समाजवाद, साम्यवाद, या गाक्सीवा पूंजीवाद, उपनिवेशवाद, लोककल्याणकारी राज्य प्रमुख रहे है । 

By- A. K. Pandey

No comments:

Post a Comment

Thanks for your love

Summary in short

Current Affairs Questions And answers

  Question 1. Consider the following statements- 1) The World Economic Forum issues the Global Energy Transition Index every year. 2) In...