यह सब कल्पना है मेरी, इस ज्वालामयी जलन की |
कुछ शेष चिन्ह है केवल, मेरे उस महा-मिलन की ||
जो धनी भूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति-सी छायी |
आंखों में आंसू बनकर, वह आज बरसने आई ||
क्यों छलक रहा था दुख मेरा, उषा की मृदु पलकों में |
हां उलझ रहा सुख मेरा, संध्या की घन अलको में ||
By- Mamta kumari

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