Sunday, January 24, 2021

जेंडर बजटिंग Gender budgeting in India with latest data Important topic in public administration

Gender budgeting in India

देश में महिला अधिकारिता और महिला सशक्तिकरण की दिशा में बजट के योगदान को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार द्वारा जेंडर बजटिंग की शुरुआत सबसे पहले 2001 में केंद्रीय बजट के अंतर्गत की गई और तब से  2005 से केंद्रीय सरकार द्वारा जेंडर बजटिंग के समस्त सार दो भागों में प्रकाशित किए जाते हैं जिसके माध्यम से सरकार द्वारा महिलाओं के विकास कल्याण और सशक्तिकरण से संबंधित योजनाओं और कार्यक्रमों के लिए प्रति वर्ष बजट में एक निर्धारित राशि की व्यवस्था सुनिश्चित करने का प्रावधान किया जाता है उल्लेखनीय है कि बजट की तमाम प्रावधान पुरुष और  स्त्री को अलग अलग तरीके से प्रभावित करते हैं दोनों के उत्तरदायित्व, भागीदारी व क्षमताएं किसी भी समाज में अलग-अलग होती हैं  | ऐसे गांव में जहां पीने की पानी की समस्या को वहां कोई खुदवाने पर किया गया खर्च पुरुषों से ज्यादा महिलाओं को प्रभावित करता है क्योंकि इसे महिलाओं के लिए घरेलू कामकाज ही दूर-दूर तालाब या नदी में पानी भरकर लाने में व्यय किए गए समय की बचत होगी | इसी तरह महिला एवं शिशु स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं पर किया गया खर्च सीधा-सीधा महिलाओं के जीवन को प्रभावित करता है हालांकि महिलाओं की सुविधा और उनके कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए अधिक बजट आवंटित कर के उद्देश्यों की पूर्ति संभव नहीं है क्योंकि इतने संवेदनशील मुद्दे को आर्थिक दायरे में सीमित कर देना उचित नहीं होगा  | इस हेतु हमें और भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे क्योंकि महिलाओं को विभिन्न तरीकों से प्रताड़ित करने वाले अनेक केस हमारे सामने हैं  जो यह सिद्ध करते हैं कि बलात्कार, हिंसा, यौन शोषण जैसे हादसे सिर्फ अशिक्षित और गरीब महिलाओं तक ही सीमित नहीं बल्कि समाज का संभ्रांत, सुशिक्षित आर्थिक रूप से स्वावलंबी महिला समाज भी इससे अछूता नहीं है | इस दृष्टि से कानून हम मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए विशेष महिला अदालतें बनाई जाए तो इस पर भी किया गया खर्च उनकी सामाजिक सुरक्षा को सीधा-सीधा प्रभावित करेगा | कानून व्यवस्था पर किया गया यह खर्चा महिला समाज को अधिक प्रभावित करता है क्योंकि रात्रि में अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करते समय उनको ज्यादा खतरा उठाना पड़ता है नाइट पेट्रोलिंग आदि पर किए गए  खर्च और महिलाओं को मिलने वाले लाभ में प्रत्यक्ष संबंध है बहुत से अध्ययन और शोध परिणामों यह सिद्ध करते हैं कि महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन का एक महत्वपूर्ण कारण उनकी अशिक्षा रही है |
महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी एक ताजा अध्ययन में पता चला है कि निशुल्क सरकारी प्रसूति व स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के बाद भी 59% मामलों में इन सुविधाओं के इस्तेमाल का स्तर अशिक्षा के कारण अत्यधिक कम है अन्य कारणों में अधिकारों के प्रति जागरूकता का अभाव और जीवन के महत्वपूर्ण मामले में स्वतंत्र निर्णय ना ले पाना है जो पुनः शिक्षा के  निम्न स्तर से जुड़े मुद्दे हैं ऐसी परिस्थितियों में महिलाओं के लिए शिक्षा पर बजट बढ़ाने की सख्त जरूरत है |
यह निश्चित है कि संसद में महिलाओं को आरक्षण दिलवाने और लिंग आधारित व्यवस्था कर आयकर में महिलाओं को विशेष छूट दिलवाने जैसी व्यवस्थाओं के साथ-साथ इस दिशा में अन्य विशेष  कदम उठाते हुुए  बहुआयामी जेंडर बजटिंग से भारत जैसे एक विकासशील देश में महिला सरोकार को ज्यादा अच्छी तरह लाभान्वित किया जा सकेगा  | यह तभी संभव है जब इस संबंध में संबंधित मंत्रालय और विभागों में जेंडर संवेदनशीलता को जागृत किया जाए  | यह इसलिए भी जरूरी है कि जिस देश में हर साल निशुल्क सरकारी प्रसूति स्वास्थ्य सुविधाओं के बावजूद 100000 महिलाएं प्रसव के कारण काल का ग्रास बनती हों 5 वर्ष की आयु के नीचे मरने वालों में लड़कों के मुकाबले दोगुनी लड़कियां हों जहां स्त्री पुरुष साक्षरता अनुपात 53 अनुपात 75 हो और तमाम प्रयासों के बावजूद देश भर में महिला पुरुष अनुपात घटता जा रहा हो जहां महिला सुरक्षा से संबंधित तमाम नियम कानून के होते हुए भी बलात्कार, यौन, शोषण, हिंसा, बाल विवाह, सती महिमामंडन और स्त्रियों के भाग्य का पर्यायवाची हो गया हो ऐसे देश में जेंडर बजटिंग जैसा नया प्रयोग निश्चित रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है .
 लेकिन इतने संवेदनशील मुद्दे को आर्थिक नजरिए के साथ-साथ गैर आर्थिक आयामों पर भी विचार समुचित प्रकार से करने की महती आवश्यकता है वैसे भी हमारे देश में एक लंबे समय से विशेष रूप से महिला संगठनों की मांग रही है कि बजट में जनरल ब्लाइंड ना होकर जनरल  सेंसेटिव होना चाहिए | वर्तमान बजट में महिलाओं से संबंधित तमाम कल्याणकारी योजनाओं और कार्यक्रमों पर किए गए कुल व्यय में अपेक्षाकृत उदार दृष्टिकोण दिखाकर सरकार ने कुछ पहल की है और अब बजट में महिलाओं से संबंधित कई नई नई योजनाओं को संचालित करके तथा पूर्व से संचालित योजनाओं के लिए अधिक से अधिक धनराशि की व्यवस्था कर इन्हें अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर दिया जा रहा है परंतु जेंडर बजटिंग के मायने विभिन्न सरकारी योजनाओं के अंतर्गत महिलाओं के लिए अधिक धन आवंटित करना ही नहीं है. इसका अर्थ की सरकारी आय और व्यय की प्राथमिकताओं को इस तरह पुनरनिर्धारित किया जाए कि जिससे लैंगिक सरोकार स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो महिला संगठन या प्रबुद्ध जन कुछ भी कहे भारत में जेंडर बजटिंग कार्ड तो महज यह बताने का प्रयास है कि महिलाओं से जुड़ी योजनाएं और कार्यक्रमों के लिए कितना धन आवंटित किया गया है | हालांकि बजट में किया गया प्रयोग सवाल उठाता है कि क्या लैंगिक प्रतिबद्धता लैंगिक सरोकार तथा लैंगिक प्राथमिकताएं जैसे तमाम शब्दों का सिर्फ  मौद्रिक संबंध में ही देखा जाना चाहिए? या गैर मौद्रिक आयामों पर भी विचार करने की जरूरत है निश्चित रूप से इसके घर मौद्रिक आयामों पर भी विचार किया जाना निहायत जरूरी है लेकिन प्रारंभिक अवस्था में ही यदि तकनीकी और बारीकियों में जाने का प्रयास किया जाएगा तो इस दिशा में समुचित प्रगति संभव नहीं हो पाएगी इस व्यवहारिकता को ध्यान में रखकर ही वर्तमान बजट में उन तमाम योजनाओं और कार्यक्रमों पर जिनका संबंध महिला और शिशु कल्याण से है कितना धन आवंटित किया गया है जिसका उल्लेख ही जेंडर बजटिंग माना गया है इस प्रकार की सीमित व्यवस्थाओं को भी शुरुआती तौर पर महिला अधिकारिता की दिशा में एक शुभ संकेत ही माना जाना चाहिए हां इसके साथ-साथ फिलहाल इस बात पर भी विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया जाना जरूरी है कि जो भी इस प्रकार की विशेष कार्यक्रम और योजनाएं संचालित हो या जो भी विशेष कदम उठाए जाएं वे अत्यधिक व्यवहारिक उपयोगी और परिणामोमुखी हो ताकि इनके सार्थक परिणाम सामने आ सके.

No comments:

Post a Comment

Thanks for your love

Summary in short

Current Affairs Questions And answers

  Question 1. Consider the following statements- 1) The World Economic Forum issues the Global Energy Transition Index every year. 2) In...