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| Indian Farmer |
भारत का किसान देश का पेट पालने के लिए तपती धूप में अपनी चमड़ी को तपा कर काला बना देता है तो कड़कड़ाती ठंड में अर्धनग्न शरीर को पानी मे डूबा गोरा बना लेता है, बदले में उसे मिलता क्या है? अगर इस बात का उत्तर ढूंढे तो शायद "कुछ नहीं" यही सही उत्तर होगा, अगर एक असली किसान ठीक ठाक पहन ओढ़ लिया तो उसके प्रति लोगों का नजरिया बदल जाता है कोई कहता "क्या शान है" कोई कहता है कि "रईसजादे" की औलाद है | यानी किसान का ठीक ठाक पहन ओढ़ लेना उसे किसान की श्रेणी से बाहर कर लाट साब बना देता है अगर उसे किसान रहना है तो उसका शरीर अर्धनग्न ही रहचाहिए। |
इस बात का अगर सही अर्थ निकाला जाए तो हम यह भी कह सकते हैं कि भारत में रहने वाले किसी भी व्यक्ति के पास संपत्ति के मौलिक अधिकारों की बात जो अनुच्छेद 12 से 35 के अंतर्गत लिखी गई थी (जिसे 44 वें संविधान संशोधन 1978 के द्वारा हटा कर अनुच्छेद 300(क) अंतर्गत लिख दिया गया था) वह कहीं ना कहीं सही साबित होती हुई प्रतीत हो रही है क्योंकि संपत्ति का अधिकार अब हमारे संविधान मे मौलिक अधिकारों का हिस्सा नहीं है,
अगर हमारे भारतीय लोकतंत्र के अंदर यह बात सही है तो कहीं ना कहीं कुछ गलत होता सा दिखाई दे रहा है हमारे समाज में ऐसे कई उदाहरण हैं जो कि इन तकिया नुसी बातों को गलत साबित कर रहें है.
उदाहरणतः
- कोई चाय वाला चाय बेचते बेचते भारत का प्रधानमंत्री बन जाता है
- कोई मसाले का व्यापार करते-करते भारत का सबसे धनी व्यक्ति बन जाता है
जब यह व्यक्ति अपनी गरीबी को पार करते हुए धीरे-धीरे भारत की सबसे धनी और मुख्य पदों पर आसीन हो सकते हैं और इस मुकाम पर पहुंचने के बाद वह अपनी मौलिकता भी भूल जाते हैं कि आखिर वह अपने भूतकाल में क्या थे और वर्तमान काल में क्या हैं, लेकिन किसान अपनी किसानी के वेरी थोड़ा बहुत कमा कर कुछ एक सामाजिक प्राणी की तरह समाज में व्यवहार करने लगता है तो विशेष वर्ग की आंखों में यह बात एक कंकड़ की तरह खटक ने लगती है और उनको हर समय यह बात असहज लगती है कि कैसे एक किसान एक सामाजिक प्राणी हो सकता है |
जैसा कि आजकल हमको देखने को भी मिल रहा है पिछले 2 महीने से लगभग किसान अपनी मांगों को सरकार के समक्ष रख रहे हैं लेकिन हर बार वार्ता का उत्तर नकारात्मक ही प्राप्त होता है और इस दौरान किसानों को अपने इस आंदोलन को चलाने के लिए मजबूरन विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है जिसने कभी कभी कुछ बाहरी सज्जन लोग किसानों की मदद के लिए अपना हाथ आगे बढ़ा देते हैं जिसमें कुछ भोग विलास जैसी सुविधाएं (खाने की चीजें) देखने को भी मिल जाती हैं तो इससे लोगों के द्वारा (विशेष वर्गों) के द्वारा यह वक्तव्य प्रचारित किए जाते हैं कि किसान तो बड़े ही ऐसो आराम की जिंदगी जी रहा है अच्छी ठाट भाट के रहन-सहन और रजवाड़ों वाले पहनावे और उनकी शख्सियत जो कि कभी किसान की वेशभूषा पहनावे चाल ढाल रहन-सहन से मेल नहीं खाती, बेकार का प्रोपेगेंडा फैलाती हुई कुछ विशेष वर्ग के लोग शायद इस बात से अनजान है कि हमको भी वही अधिकार मिले हैं जो कि भोग विलास जीवन व्यतीत करने वाले लोगों को, और हम अपना जीवन सामाजिक आर्थिक व राजनैतिक अधिकारों के चलते एक गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है और यह अधिकार आम जनमानस को भी है, जिसमें मजदूर, किसान तथा समाज का अंतिम व्यक्ति सभी को यह अधिकार समान ही प्राप्त हुए हैं जो कि मुख्य रूप से संविधान के द्वारा प्रदान कराए जाते हैं, उसमें भी अहम भूमिका होती है हमारे लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ (न्यायपालिका) जो कि हमारे संविधान और अधिकारों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयासरत रहती है।
भारतीय संविधान के अनुसार भारत में सर्वोच्च जनता है जिसमें देश के 70% लोगों की सहभागिता अहम है,फिर भी जब कभी ऐसे आंदोलन होते हैं तो सबसे पहले भारत का संविधान ही कटघरे में नजर आता है कि जब जनता का,जनता के लिए,जनता के द्वारा संविधान है तो इस प्रकार की विषमता कैसे?
आखिर क्या कारण है कि देश के एक बड़े वर्ग को सड़कों पे उतरना पड़ता है? क्या कहने के लिए देश का शासन जनता के द्वारा है और वस्त्विकता में संभ्रांतों के द्वारा। यदि ऐसा ही चलता रहा तो विश्व के सबसे बड़ा संविधान की अस्मिता पर प्रश्नवाचक चिन्ह सबसे पहले लगेगा।
इसके लिए आवश्यक है कि देश की 70% जनसंख्या जो गांव में निवास करती है और जिनके जीवन यापन का माध्यम खेती और किसानी ही है कोई भी कानून बनाने के पहले उनकी राय लेना आवश्यक है,
संसद में बैठे सांसदों को क्या पता खेत मे काम करने वाले किसानों की पीड़ा जिसके हाँ पर कोई भी प्रस्ताव कानून का रूप धारण कर लेता है।
By- ASHUTOSH OJHA

Thanks for this precious information
ReplyDeleteThanks sir
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