जब कहीं सुनता हूं कि हमारा देश आज अलग बुलंदियों के मुकाम को छू रहा है तो मन में ख्याल आता है की यह सच है या व्यर्थ ही इस बात को प्रपंचित किया जारहा है जब देखता हूँ अपने देश को तो हर बार यही एहसास होता है कि यह वही भारत है जिसकी कल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी जिन्होंने अपने संघर्ष और कड़ी मेहनतसे इस भारत की बंजर जमीन में लोहे की मोटी-मोटी सलाखें डालकर अपने कंधों पर लकड़ी की मांचीर को रखकर बैलों की तरह पूरे-पूरे दिन उस लोहे की सलाख कोतब तक खींचा था जब तक उस भूमि को सोना पैदा करने वाली खानों के रूप बदल दिया
तब तक वह न रुकता और न ही तो वह थकता था रात दिन अपने आने वाले कल की भविष्य को सुखमय बनाने के लिए उसने अपने आज का त्याग करके कठिनपरिस्थितियों मे गुजारा किया उसे एक क्षण के लिए यह एहसास ना हुआ कि वह किन कठिन और विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है उसे तो यह पता भी नहीं था किवह अपनी जिंदगी को आने वाले भविष्य के भरोसे ताख़ पर रख रहा है जिसका कोई अभी दूर-दूर तक ताना बाना भी नहीं है लेकिन फिर भी एक आस थी कि उसेअपनों के भविष्य को सुधारना, सवारना और सुखमय बनाना है
और जब मै आज की तुलना भूत (पीछे) के भारत से करता हूं तो पाता हूं कि क्या यह वही कल्पनाशक्ति थी जो अपने आज को साकार रूप देने के लिए अग्रसर थीऔर क्या आज उसका एक मूर्त रूप दे चुकी है
जहां हर कोई मतलबी है हर कोई स्वार्थी है किसी भी मानस को यह नहीं पड़ी कि कौन व्यक्ति पीड़ित है कौन प्रताड़ित कौन कर्ज में डूबा है और कौन भूख में है, यहांकिसी को नहीं पड़ी कि वह कौन...... आखिर है कौन ना कोई जानता है और ना ही कोई जानना चाहता है क्योंकि आज व्यक्ति अपनी जीवन में इतना अधिक लिप्तहो चुका है कि वह खुद नहीं जानता उसका जीवन किस राह पर जा रहा है
पता नहीं मैं इसको जीवन कहूं यह भोग विलास का व्यर्थ जीवन जहां पर उसे ना तो अपनी पड़ी है और ना ही सामने वाले इंसान की, आज व्यक्ति को न तो दूसरोंके भविष्य को सुधारने की चिंता है और न तो उनके भविष्य के बारे में सोचने कि, आज उसे खुद का भविष्य बनाने तक की फुर्सत नहीं है पता नहीं किस दौड़ में भागे जारहा है बस भागे जा रहा है ना अब का पता है ना आज का पता और न आने वाले कल का बस सुबह से शाम उसका जीवन एक रफ्तार भरी दौड़ की तरह दिखाई देता हैजिसका न कोई ओर है और ना कोई छोर,
यह वह दौड़ है जो कभी समाप्त नहीं होती और ही इसमें कोई अल्पविराम है और ना ही कोई पूर्णविराम यहां व्यक्ति अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने कीचाह में बस भागे जा रहा है,
और इस जद्दोजहद भरी दौड़ में कभी-कभी वह अपनों से ही लड़कर या उनसे धोखा करके उन्हीं को हराकर पीछे छोड़ देना चाहताहै उसको यह नहीं पता होता की इस दौड़ का कोई अंत नहीं है इस दौड़ को पूरा करने के लिए हराकर नहीं बल्कि साथ चल कर एक दूसरे को अपना सहाराबना कर इसकी अंत तक पहुंचा जा सकता है यहां दौड़ पूरी कर लेना जिंदगी का कोई लक्ष्य तो नहीं है लेकिन जिंदगी का सच ही एक दौड़ है और इस दौड़को हम पूरा तभी कर सकते हैं जब अपने आसपास की जनमानस को साथ लेकर चले, ना कि उनका साथ छोड़ कर, आज हमारे आसपास के जो लोग जिनसेबिना जाने समझे दूर होते जा रहे हैं और हम भी उनसे दूरियां बढ़ाते ही दिखाई देते हैं जिससे हम अपने आज से ही अपने भविष्य को दूर धकेल रहे हैं जिससेकि हम अपने आप को और अपने आने वाले कल को एक अंधकार रूपी खाई की ओर ली जा रही हैं जिसमें ना तो कोई रास्ता दिखाई देता है और ना ही कोईरास्ता दिखाने वाला दीपक हमारे साथ होता है

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